Rati Ghati Yuddh : इतिहास के पन्नों में दबा भारत का गौरव "राती घाटी युद्ध"
राती घाटी का युद्ध भारत के राष्ट्रीय गौरव का प्रतीक होने के साथ ही यहाँ के वीरों के अदम्य साहस और रणनीति का परिचायक है | यह युद्ध भारत की उत्तर-पश्चिमी सीमा पर बीकानेर में 26 अक्टूबर 1534 को लड़ा गया...
View Articleपुष्कर युद्ध में मेड़तिया राठौड़ राजसिंहजी का बलिदान
पुष्कर युद्ध में मेड़तिया राठौड़ राजसिंहजी का बलिदान : लेखक हरीशचन्द्रसिंह आलनियावास मुगल बादशाह औरंगजेब के समय शाही आज्ञानुसार मारवाड़ में जब मुगल सैनिकों द्वारा मंदिर एवं देवालय आदि ध्वस्त किए जाने...
View Articleराती घाटी का युद्ध – जब बीकानेर ने मुगलों को दी थी मात | भारत का भूला हुआ...
भारत के मरुस्थल की रेत पर लिखा गया था एक ऐसा इतिहास...जिसे आज भी रेगिस्तान में चलने वाली गर्म हवाएं गर्व से सुनाती है — राती घाटी का युद्ध, जहाँ बीकानेर के वीरों ने मुगल बादशाह बाबर के पुत्र कामरान को...
View ArticleHistorical Latter's of Danta Thikana ठिकाना दांता के कुछ ऐतिहासिक पत्र
ठिकाना दांता के कुछ ऐतिहासिक पत्रइतिहास, भाषा शास्त्रीय अध्ययन अेवं रीति-रिवाज और लेखन प्रणाली आदि की परिचिति के लिए प्राचीन ताम्र पत्र, शिला लेख और शासन पत्र बड़े उपयोगी माने गये हैं। शासन पत्रों में...
View ArticleSome Dingal lyricists from the Rao caste राव जाति के कुछ डिंगल गीतकार
राव जाति के कुछ डिंगल गीतकारराजस्थान में गीत संज्ञक रचनाओं से दो प्रकार के गीत साहित्य का बोध होता है। प्रथम प्रकार के लोक गीत और दूसरी प्रकार के डिंगल गीत कहलाते हैं। लोक गीतों में विवाह, जन्मोत्सव,...
View Articleकहानी राजस्थान की रानियों की जनानी ड्योढ़ियों की
अन्तःपुर के पर्याप्त रूप में राजस्थान में जनाने महल, जनानी ड्योढ़ी, रणिवास, रावळा, अंतेउर, भीतर, अन्तहपुर और मांयने शब्दों का व्यवहार होता है। रणवास अथवा जनानी ड्योढ़ी राजमहलों का वह भाग होता है जिसमें...
View Articleकहानी रनिवासों की | राजस्थान की रानियों के पत्र
जनानी ड्योढ़ी की राजस्थानी नारियों पर राजस्थान के प्राप्य इतिहस ग्रंथों में समुचित विचार अभी नहीं हुआ है। इतिहास ने उनके व्यक्तित्व और कृतित्व पर सच्चाई के साथ विचार नहीं किया है। राजस्थानी राजमहलों की...
View Articleराजस्थान की रानियों के रोचक पत्र : कहानी जनानी ड्योढ़ियों की
जनानी ड्योढ़ी के रीतिरिवाज और रहन-सहन आदि के नियम बंधे हुए थे। राजमाताऐं अथवा रानियों के भोजनालय, पोशाकों, उनके निजी सेवकों के वेतन आदि की राशि निश्चित होती थी। और जहां राजकोष से नकद में न देकर जागीर के...
View ArticleGhanerao History : घाणेराव ठिकाने का इतिहास
मेवाड़ और मारवाड़ राज्य के मध्य बसा है गोडवाड़ प्रदेश, और इसी प्रदेश में है मेड़तिया राठौड़ों का ठिकाना घाणेराव | रियासती काल में कुम्भलगढ़ की सुरक्षा का महत्त्वपूर्ण भार इसी ठिकाने पर था | घाणेराव धार्मिक...
View ArticleRao Duda Mertia मेड़ता का शासक राव दूदा (दुर्जनशाल) (1495-1515.) : Part-1
स्वनामधन्य दूदा मेड़तिया राठौड़ों का मूल पुरुष है । संवत् 1555 के शिलालेख में दूदा का नाम नृप दुर्जनशल्य के रूप में मिलता है। एक प्रतापी शासक होने के साथ इनके वंशज भी प्रतापी और प्रख्यात हुए ।जोधपुर के...
View ArticleRao Duda Mertia मेड़ता का शासक राव दूदा : मेघा सींधल का वध : Part-2
भाग -१ से आगे। .......दूदा द्वारा मेघा सींधल का वध-राज्य आश्रित चारण कवि राजाओं को पुरानी ऐतिहासिक बातें सुनाया करते थे जिससे न केवल मनोरंजन होता था अपितु राजाओं को अपने पूर्वजों के इतिहास की भी...
View ArticleRao Duda Mertia मेड़ता का शासक राव दूदा : मेड़ता की पुनः स्थापना Part -3
भाग -2 से आगे। ......मेड़ता की पुनः स्थापनामेड़ता नगर, जिसे वरसिंह दूदा ने आबाद किया जोधपुर से 117 कि.मी. उत्तर - पूर्व में स्थित है। ऐसी मान्यता है कि पौराणिक राजा मानधाता ने इसे बसाया था। इसका...
View ArticleRao Duda Mertia मेड़ता का शासक राव दूदा : बीका के पास जांगलू जाना Part-4
भाग 3 से आगे। .......दूदा का रायण अनन्तर बीका के पास जांगलू जाना-दोनों भाइयों के पारस्परिक सहयोग तथा परिश्रम से सम्पूर्ण मेड़ता परगना आबाद हो गया। चूंकि मेड़ता के आसपास के क्षेत्रों का एकीकरण कर उसे एक...
View ArticleRao Duda Mertia मेड़ता का शासक राव दूदा : भाग -5
भाग -4 से आगे। ...............वरसिंह की सांभर पर चढ़ाई और मल्लूखां का मारवाड़ पर आक्रमण-वि.सं. 1547 (ई.सं. 1490) में मेड़ता में अकाल पड़ा । धान्य के अभाव में वहां की प्रजा को अनेक कष्ट सहन करने पड़े।...
View ArticleRao Duda Mertia मेड़ता का शासक राव दूदा : योगदान
भाग -5 से आगे। .............शासक के रूप में राव दूदा का योगदान-राव दूदा के जीवन सम्बन्धी उपर्युक्त घटनाओं का अध्ययन करें तो ज्ञात होता है कि मेड़ता की स्थापना में मुख्य रूप से दूदा का योगदान रहा। उसने...
View Articleघाटवा का युद्ध (१४८८ ई.) - भाग १ : गौड़ शक्ति का राजस्थान में पतन
लेखक : प्रकाश सिंह राठौड़ भारतीय इतिहास, विशेषकर राजस्थान का मध्यकालीन इतिहास, केवल साम्राज्यों के उत्थान और पतन की कहानी नहीं है, बल्कि यह स्वाभिमान, कुल-गौरव और क्षेत्रीय संप्रभुता के लिए लड़े गए...
View Articleघाटवा का युद्ध (१४८८ ई.) - भाग 2
लेखक : प्रकाश सिंह राठौड़ भाग -१ से आगे राव शेखा की विस्तारवादी नीति का सीधा टकराव गौड़ राजपूतों के हितों से हुआ। गौड़वाटी और शेखावाटी की सीमाएं एक-दूसरे से सटी हुई थीं, और दोनों ही...
View Articleबारहठ नरहरिदास और गिरिधरदास
लेखक : ठाकुर सौभाग्यसिंह शेखावत (राजस्थानी भाषा के मूर्धन्य साहित्यकार एवं इतिहासकार)कविवर लक्खाजी बारहठ शाही दरबार के सम्मान प्राप्त व्यक्ति थे । बादशाह अकबर की उदार तथा सभी धर्मों के प्रति उचित...
View Articleबलभद्र (बल्लूजी) चांपावत का इतिहास कवि केशवदास गाडण के गीतों में
नागौर के इतिहास प्रसिद्ध वीर राव अमरसिंह राठौड़ ने आगरा दुर्ग के शाही दरबार में बख्शी सलाबत खां को कटार से मार डाला था । राव अमरसिंह के इस साहसिक कार्य से आतंकित होकर बादशाह शाहजहां, दाराशिकोह दरबार...
View Articleकेशवदास नामक दो चारण कवि
लेखक : ठाकुर सौभाग्य सिंह जी शेखावत डिंगल कवियों में केशवदास गाडण का उच्चस्थान है । ये मारवाड़ के गाडणों की बासणी के रहने वाले और जोधपुर के महाराजा गजसिंह के प्राश्रित थे । इनके पिता का नाम सदमाल था ।...
View Articleडंगरसी रतनू कृत : चित्तौड़ के तृतीय साके का एक समकालीन काव्य ग्रन्थ
लेखक : ठाकुर सौभाग्य सिंह जी शेखावत साका और जौहर के लिए विश्व के वीरसमाज में वंदनीय चित्तौड़ भारतीय समाज का पवित्र तीर्थ रहा है । चित्तौड़ ने जहां अनेक बार युद्ध लड़ श्रोणित-सलिल में स्नान किया, वहाँ...
View Articleवीर चिलाराय (शुक्लध्वज): पूर्वोत्तर भारत के “संग्रामसिंह” की ऐतिहासिक गाथा
वीर चिलाराय (शुक्लध्वज): पूर्वोत्तर भारत के “संग्रामसिंह” की ऐतिहासिक गाथा(सरत चन्द्र घोषाल कृत “History of Cooch Behar” में वर्णित विवरणों के आधार पर)पूर्वोत्तर भारत के 16वीं शताब्दी के इतिहास में...
View Articleजब एक चारण कवि जोगीदास ने जोधपुर के राजा मानसिंह को चुनौती दी
जोधपुर के राजा मानसिंह की चारणों पर विशेष कृपा थी | यदि उनसे कोई अपराध भी हो जाता तो मानसिंह उन्हें क्षमा कर देते थे | एक बार जोगीदास नामक अपने कृपा पात्र चारण को राजा मानसिंह ने फलोदी का हाकिम नियुक्त...
View Articleकछवाहा राजवंश का गौरवशाली इतिहास -1
कछवाहा राजवंश का गौरवशाली इतिहास: History of Kachhvah Rajvansh in Hindi : आज हम बात करेंगे राजस्थान के उस गौरवशाली राजवंश की, जिसने वीरता, स्वाभिमान और त्याग की परम्पराओं को इतिहास में अमर कर दिया — उस...
View Articleकछवाह राजवंश का राजस्थान में आगमन - kachhvah History -2
कछवाह राजवंश का राजस्थान में आगमन पिछले लेख मेंहमने आपको बताया था कि मध्यप्रदेश से आकर दुल्हेराय कछवाह — जिन्हें इतिहास में दुर्लभराय और तेजकरण के नाम से भी लिखा गया है — उन्होंने राजस्थान में कछवाह...
View Article